Saturday, January 9, 2010

अध्यात्म की अलख जगा रहीं आस्था भारती


-डॉ. अशोक प्रियरंजन
साध्वी आस्था भारती रामकथा, कृष्णकथा, श्रीमद्भागवतकथा, कृष्णकथा, हरिकथा सुनाकर संपूर्ण देश में धर्म और अध्यात्म की अलख जगा रही हैं। उन्होंने भारतीय संस्कृति की उस रुढि़ को तोड़ा है जिसमें महिलाओं के व्यास पीठ पर बैठने को वर्जित माना गया है। दिव्य ज्योति जागृति संस्थान के अधिष्ठाता आशुतोष महाराज की शिष्या आस्था भारती जब सुमधुर वाणी में प्रवचन करती हैं तो पांडाल के संपूर्ण परिवेश में उत्पन्न अध्यात्म की पवित्र रसधारा श्रोताओं को सराबोर कर देती है। उनकी वाणी से उत्पन्न प्रत्येक शब्द श्रोता के मन को भाव विभोर कर देता है। मेरठ का जीमखाना मैदान हो या दिल्ली के मॉडल टाउन का पांडाल, सभी स्थानों पर वह श्रोताओं को अध्यात्म की अद्भुत अनुभूति से साक्षात्कार कराने में समर्थ दिखाई देती हैं। नारियुक्त कलशों से सजे मंच की सज्जा भी मनमोहक होती है। कथा के दौरान १५ युवा साध्वियों का दल हारमोनियम, वायलिन, सितार, बांसुरी और मेंडोलिन आदि वाद्य यंत्रां के सुर कथा को संगतीमय बना देते हैं। लाल तिलक लगाए पीतवस्त्रधारी युवा साधक और चंदन का तिलक लगाए सुर्ख लाल वस्त्रधारी साध्वी सहज ही लोगों का ध्यान आकर्षित कर लेती हैं। नौ दिन कथा के बाद दसवें दिन यज्ञ होता है। संगीतमय कथा से उपजी आध्यत्मिक अनुभूति श्रोताओं को आल्हादित कर देती है। साध्वी आस्था भारती के विचार व्यापक जनमानस की चेतना को आलोकित करने में समर्थ हैं।
आत्मा-परमात्मा के मिलन में ही परमानंद
आस्था भारती का मानना है कि आत्मा से साक्षात्कार करने पर ही मनुष्य को शांति प्राप्त होती है। आत्मा और परमात्मा के मिलन से ही मनुष्य को परमानंद की अनुभूति होती है। भौतिक संपदा से मनुष्य का शरीर तृप्त हो सकता है, आत्मा नहीं। भक्त की आत्मा सदैव ईश्वर से मिलन के लिए व्याकुल रहती है। सर्वशक्तिमान भगवान की लीलाएं हमेशा मनुष्य के लिए रहस्य बनी रही हैं। वह भगवान को अपनी बुद्धि के द्वारा समझाना चाहता है, जो कि संभव नहीं है। रावण, कंस और दुर्योधन जैसे लोगों को भगवान की लीलाओं से धोखा खाना पड़ा। भगवान की प्रत्येक लीला में आध्यात्मिक रहस्य छुपा होता है।
अंतरज्योति जागृत करने वाला ही गुरु
उनका मानना है कि मनुष्य को उसके अस्तित्व की पहचान कराना आवश्यक है। जीवन के लक्ष्य से अवगत कराने पर ही मनुष्य का कल्याण संभव है। तत्व ज्ञान की प्राप्ति के लिए गुरु की आवश्यकता होती है। गुरु वह होता है जो मनुष्य की अंतर ज्योति को जागृत कर दे। अंतरज्योति जागृत होने पर ही ईश्वर के दर्शन प्राप्त करना संभव है। ज्ञान प्राप्त होने से ही मनुष्य समाज में अपनी पहचान बना पाता है। गुरु के सान्निध्य में मनुष्य को ज्ञान प्राप्त होता है जिसे वह समाज के प्रति अपने उत्तरदायित्वों को भली प्रकार से पूर्ण कर पाता है। आज अनेक लोग ईश्वर का नाम जपते हैं लेकिन प्रभु प्रकट नहीं होते हंै। इसका कारण यह यह है कि हम ईश्वर को जानते नहीं। जाने बिन न होई परतीती, बिन परतीती न होई प्रीति। बिना जाने हमें किसी चीज पर विश्वास नहीं हो सकता। यदि हम चाहते हैं जैसे प्रहलाद की नरसिंह भगवान ने, द्रोपदी और मीरा की कृष्ण ने रक्षा की थी, उसी तरह प्रभु हमारी रक्षा करें तो हमें किसी तत्वज्ञानी गुरु के समक्ष समर्पित होना पड़ेगा।
रुढियां तोड़कर व्यासपीठ पर विराजी महिलाएं
आस्था भारती के अनुसार मुगलकाल में सुरक्षा संबंधी कारणों से लड़की को घर के अंदर ही रखा गया। बाल विवाह, सती प्रथा जैसी कुरीतियां भी समाज में व्याप्त हुईं। इसी कारण लड़कियों और महिलाओं को लेकर समाज की रुढिवादी मनोवृत्ति बन गई। अब स्थिति बदल रही है। नारी शक्ति की गरिमा से संपूर्ण भूमंडल आलोकित हो रहा है। आज समस्त क्षेत्रों में महिलाएं अपनी पहचान बना रही हैं। प्राचीन काल से महिलाओं ने विविध क्षेत्रों में अपने ज्ञान की गरिमामय अभिव्यक्ति प्रदान की है। आज व्यापक फलक पर महिलाएं अपनी पहचान बना रही हैं। धर्म और अध्यात्म के प्रचार-प्रसार में भी महिलाओं की भूमिका बड़ी महत्वपूर्ण है। रुढि़वादी मान्यताओं के विपरीत व्यासपीठ पर भी महिलाएं विराजमान हैं। धर्म क्षेत्र में सक्रिय नारियां समाज के व्यापक वर्ग का मार्गदर्शन करते हुए वैचारिक परिवर्तन में महती भूमिका निभा रही हैं। वह नारियों द्वारा कर्मकांड करने को पूर्णत: सही मानती हैं
अध्यात्म से ही देश का कल्याण
विदुषी का मानना है कि सुप्त नागरिकों में कोई चेतना जागृत कर सकता है तो वह आध्यात्मिक ब्रह्मïज्ञान ही है। साध्वी ने कहा कि हमारे तिरंगे में सबसे ऊपर केसरिया रंग आध्यात्म का प्रतीक है। यह भाव आज के समय सुषुप्त अवस्था में है। इसके बाद शांति का प्रतीक सफेद रंग है। शांति वहीं होगी जहां अध्यात्म होगा। तीसरा हरा रंग समृद्धि का प्रतीक है। जब तक आध्यात्म की भावना जागृत नहीं होगी तब तक देश और देशवासी तरक्की नहीं कर सकते। जब तक तत्वज्ञान नहीं होता तब तक मनुष्य जीवन भी अंधकारमय रहता है।
कर्मफल भोगता है मनुष्य
आस्था भारती की विचारणा है कि कर्मों का फल हर व्यक्ति को भोगना पड़ता है। बाणों की शैय्या पर लेटे हुए भीष्म पितामह ने कृष्ण से पूछा कि उन्होंने ऐसे कौन से कर्म किए जो अंतिम समय में दारुण दुख सहना पड़ रहा है। कृष्ण ने बताया कि वह राज्य में मुख्य न्यायाधीश की भूमिका में थे, ब्रह्मïचारी थे और प्रतिज्ञा निष्ठï थे। फिर भी वह द्रोपदी का चीरहरण होते हुए देखते रहे। ऐसे ही कर्मों का फल उन्हें इस जन्म में भोगना पड़ रहा है।
बच्चों में हिंसक प्रवृत्ति के लिए माता पिता जिम्मेदा
साध्वी ने माता पिताओं को बच्चों में हिंसा की भावना को पनपने के लिए जिम्मेदार बताया। उन्होंने कहा कि पहले लोग गुड्डïे गुडिय़ों से अपने बच्चों को खेलते देख खुश होते थे। अब बच्चे होली की पिचकारी भी खरीदते हैं तो गन वाली। महावीर और गौतम बुद्ध के देश में बढ़ रही हिंसक वारदातों पर रोक लगाने के लिए उन्होंने कहा कि हम अपने मूल परंपराओं से भटक रहे हैं। मनुष्य को ब्रह्मज्ञान कराना जरूरी है और वर्तमान समय में यह भारत ही नहीं, संपूर्ण विश्व की आवश्यकता है।
(अमर उजाला के नौ जनवरी २०१० के अंक में श्रद्धा पेज पर प्रकाशित)

3 comments:

योगेश स्वप्न said...

itne sunder lekh aur jaankari ke liye aabhaar.

Maria Mcclain said...

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bhushan Sahu said...

इतने महान जानकारी दे कर हमेँ गौरवकृत कर दिया धन्यवाद